मैं शून्य पे सवार हूँ… -Zakir khan

 मैं शून्य पे सवार हूँ !
बेअदब सा मैं खुमार हूँ |
अब मुश्किलों से क्या डरूं ,
मैं खुद कहर हज़ार हूँ |
मैं शून्य पे सवार हूँ !
मैं शून्य पे सवार हूँ !

उंच-नीच से परे ,
मजाल आँख में भरे ,
मैं लड़ रहा हूँ रात से ,
मशाल हाथ में लिए |
न सूर्य मेरे साथ है ,
तो क्या नयी ये बात है |
वो शाम होता ढल गया |
वो रात से था डर गया |
मैं जुगनुओं का यार हूँ !
मैं शून्य पे सवार हूँ !
मैं शून्य पे सवार हूँ !

भावनाएं मर चुकीं ,
संवेदनाएं खत्म हैं |
अब दर्द से क्या डरूं ,
ज़िन्दगी ही ज़ख्म है |
मैं बीच राह की मात हूँ ! 
बेजान-स्याह रात हूँ |
मैं काली का श्रृंगार हूँ !
मैं शून्य पे सवार हूँ !
मैं शून्य पे सवार हूँ !

हूँ राम का सा तेज मैं ,
लंकापति सा ज्ञान हूँ |
किस की करूं आराधना ,
सब से जो मैं महान हूँ |
ब्रह्माण्ड का मैं सार हूँ !
मैं जल-प्रवाह निहार हूँ !
मैं शून्य पे सवार हूँ ! 
मैं शून्य पे सवार हूँ !

– ज़ाकिर खान

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