मेरे कुछ सवाल हैं ! – Zakir khan

मेरे कुछ सवाल हैं ,

जो सिर्फ क़यामत के रोज़ पूछूंगा तुमसे |

क्योंकि उसके पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके ,

इस लायक नहीं हो तुम।

 

मैं जानना चाहता हूँ |

क्या रकीब के साथ भी चलते हुए ,

शाम को यूं हीे बेखयाली में ,

उसके साथ भी हाथ टकरा जाता है तुम्हारा ?

क्या अपनी छोटी ऊँगली से ,

उसका भी हाथ थाम लिया करती हो ,

क्या वैसे ही जैसे मेरा थामा करती थीं ?

क्या बता दीं बचपन की सारी कहानियां तुमने उसको ,

जैसे मुझको रात रात भर बैठ कर सुनाई थी तुमने ?

क्या तुमने बताया उसको ,

कि पांच के आगे की हिंदी की गिनती आती नहीं तुमको ?

वो सारी तस्वीरें जो तुम्हारे पापा के साथ,

तुम्हारे भाई के साथ की थी,

जिनमे तुम बड़ी प्यारी लगीं,

क्या उसे भी दिखा दी तुमने ?

 

ये कुछ सवाल हैं , 

जो सिर्फ क़यामत के रोज़ पूँछूगा तुमसे |

क्योंकि उसके पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके ,

इस लायक नहीं हो तुम |

 

मैं पूंछना चाहता हूँ कि ,

क्या वो भी जब घर छोड़ने आता है तुमको ,

तो सीढ़ियों पर आँखें मीच कर क्या मेरी ही तरह ,

उसके भी सामने माथा आगे कर देती हो तुम वैसे ही,

जैसे मेरे सामने किया करतीं थीं ?

सर्द रातों में,

बंद कमरों में क्या वो भी मेरी तरह ,

तुम्हारी नंगी पीठ पर ,

अपनी उँगलियों से हर्फ़ दर हर्फ़ ,

खुद का नाम गोदता है ,

और क्या तुम भी अक्षर बा अक्षर ,

पहचानने की कोशिश करती हो ,

जैसे मेरे साथ किया करती थीं ?

 

ये कुछ सवाल हैं , 

जो सिर्फ क़यामत के रोज़ पूँछूगा तुमसे |

क्योंकि उसके पहले तुम्हारी और मेरी बात हो सके ,

इस लायक नहीं हो तुम |

-ज़ाकिर खान

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